कागजों की उलझन में फंसा बुढ़ापा: संजय बैंस की पहल से 70 वर्षीय गणेशिया बाई को मिली पूरी महतारी वंदन राशि

दिनेश नेताम 

कुसुमकसा 

            संजय बैंस एक नाम नही बल्कि लोगों के लिए मददगार के रूप मे पहचान और लोगों के मन मे विश्वास जगाता है लोंग उम्मीद लगा कर पहुंचते है उन्ही के मदद से अब गणेशिया बाई क़ो 1000 रूपये मिलेंगे। उनका कहना है, मैं तो पूरी तरह से उम्मीद  ही छोड़ दी थी,भगवान बनकर आए मेरे लिए संजय बेटा ।” यह कहते हुए 70 वर्षीय गणेशिया बाई देशमुख की आंखें भर आईं। कुसुमकसा निवासी गणेशिया बाई पिछले कई महीनों से महतारी वंदन योजना की आधी-अधूरी राशि के कारण परेशान थीं। सरकारी योजना में महिलाओं को 1000 रुपये मिलते हैं, लेकिन उनके खाते में हर माह सिर्फ 500 रुपये ही पहुंच रहे थे।

दरअसल, फॉर्म भरते समय हुई विभागीय त्रुटि ने गणेशिया बाई का सहारा छीन लिया था। उनके आवेदन में गलती हो गया, जबकि उन्होंने कभी वृद्धा पेंशन के लिए आवेदन ही नहीं किया था। नतीजा यह हुआ कि महतारी वंदन योजना से 1000 की जगह केवल 500 रुपये मिलने लगे। बार-बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के चक्कर काटने पर भी उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं।


गणेशिया बाई अपने पति के साथ रहती हैं। दोनों की उम्र 70 पार है और उनकी कोई संतान नहीं है। बुढ़ापे में जीवनयापन का एकमात्र सहारा सरकार की यह योजना ही थी। आधा पैसा मिलने से घर चलाना मुश्किल हो रहा था।


हताश होकर गणेशिया बाई ने पूर्व जनपद सदस्य संजय बैंस से गुहार लगाई। संजय बैंस ने मामले को गंभीरता से लिया और तुरंत विभागीय अधिकारियों से संपर्क कर पूरी जानकारी जुटाई। उनकी पहल पर विभागीय चूक सुधारी गई और इस माह से गणेशिया बाई के खाते में पूरे 1000 रुपये आना शुरू हो गए हैं।



खाते में पूरी राशि देखकर गणेशिया बाई भावुक हो गईं। उन्होंने कहा, “संजय भैया ने बुढ़ापे में हमारा सहारा बनकर दिखाया। अब दो वक्त की रोटी की चिंता थोड़ी कम होगी।”


स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि संजय बैंस ने फिर साबित किया है कि जनप्रतिनिधि संवेदनशील हो तो कागजों में अटकी योजनाएं भी जमीन पर उतरती हैं। यह मामला बताता है कि एक छोटी सी लिपिकीय गलती किसी बुजुर्ग की जिंदगी कितनी मुश्किल बना सकती है।



इस पर संजय बैंस ने कहा, “प्रशासन और जनता के बीच सेतु बनना हमारा फर्ज है। जब कोई बुजुर्ग मदद के लिए आता है तो उसकी समस्या को टालना नहीं चाहिए। आज गणेशिया बाई के चेहरे की मुस्कान देखकर लगता है कि प्रयास सार्थक हुआ।” 


एक जनप्रतिनिधि की पहल ने न सिर्फ 70 साल की बुजुर्ग महिला को उसका हक दिलाया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि व्यवस्था में संवेदना जिंदा हो तो समाधान निकल ही आता है।

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