सर्व आदिवासी समाज ब्लॉक डौण्डी ने माननीय राष्ट्रपति के नाम विभिन्न मांगो को लेकर तहसील कार्यालय मे सौपा ज्ञापन।

 दिनेश नेताम 

 डौण्डी 

 दिनांक 22 जून 2026 दिन सोमवार को सर आदिवासी समाज ब्लॉक डौंडी द्वारा माननीय राष्ट्रपति के नाम तहसील कार्यालय में ज्ञापन सौपा गया आदिवासी समाज के अनुसार छत्तीसगढ़ के विभिन्न आदिवासी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, कर्मचारी, युवा एवं जनसंगठनों की ओर से आपका ध्यान स्कूल शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जारी पत्र क्रमांक GENCOR-35010/1981/2026-SCHOOL EDUCATION SECTION दिनांक 12 जून 2026 की ओर आकर्षित करना चाहते हैं, जिसमें शासकीय विद्यालयों में प्रतिदिन प्रार्थना के दौरान "सरस्वती वंदना", "गुरु मंत्र", "गायत्री मंत्र", "शांति मंत्र" आदि धार्मिक गतिविधियों के आयोजन के निर्देश दिए गए हैं।


छत्तीसगढ़ एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक एवं बहुभाषी राज्य है, जहां आदिवासी समुदायों की अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताएं, पेन परंपरा, सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान प्रणाली एवं जीवन-दर्शन है। राज्य द्वारा संचालित विद्यालयों में किसी विशेष धार्मिक परंपरा से संबंधित प्रार्थनाओं एवं मंत्रों को अनिवार्य करना संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना, सांस्कृतिक विविधता तथा सभी नागरिकों के समान अधिकारों के प्रतिकूल प्रतीत होता है।



भारत का संविधान विविधता में एकता, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक संरक्षण तथा सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। अतः राज्य द्वारा वित्तपोषित विद्यालयों में किसी विशेष धार्मिक परंपरा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संस्थागत प्रचार संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।


संवैधानिक एवं विधिक आधार


1. अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समानता एवं विधि के समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।


2. अनुच्छेद 15 राज्य को धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव करने से प्रतिबंधित करता है।


3. अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने अथवा न मानने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।


4. अनुच्छेद 28(1) के अनुसार राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा अथवा धार्मिक उपासना नहीं कराई जा सकती।


5. अनुच्छेद 28(3) के अनुसार किसी भी छात्र को धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में भाग लेने हेतु बाध्य नहीं किया जा सकता।


6. अनुच्छेद 29(1) विशिष्ट भाषा, लिपि एवं संस्कृति रखने वाले वर्गों को अपनी संस्कृति के संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है। आदिवासी समाज की सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपराएं भी इसी संवैधानिक संरक्षण के अंतर्गत आती है।


7. अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने तथा उन्हें सामाजिक अन्याय एवं शोषण से संरक्षण प्रदान करने का निर्देश देता है।


8. पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों एवं अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक हितों की विशेष सुरक्षा सुनिश्चित करती है।


9. अनुच्छेद 13 के अनुसार संविधान के भाग-3 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई भी विधि, आदेश अथवा कार्यवाही शून्य मानी जाएगी।


10. भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य पोषित करती है। अतः राज्य संचालित विद्यालयों में किसी एक धर्म विशेष की धार्मिक गतिविधियों को अनिवार्य बनाना संविधान की मूल भावना के विपरीत है।


हमारी मांगें


1. दिनांक 12 जून 2026 को जारी उक्त आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।


2. शासकीय विद्यालयों में किसी भी धर्म, संप्रदाय अथवा पंध विशेष की प्रार्थना, मंत्र, वंदना अथवा धार्मिक अनुष्ठान को अनिवार्य न किया जाए।


3. विद्यालयों में संचालित प्रार्थना, नैतिक शिक्षा एवं व्यक्तित्व विकास कार्यक्रमों को संविधान, लोकतंत्र, समानता, बंधुत्व, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण संरक्षण एवं मानवीय मूल्यों पर आधारित किया जाए।


4. आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं, संस्कृति, इतिहास, पारंपरिक ज्ञान एवं संविधान सम्मत सांस्कृतिक विविधता को सम्मानजनक स्थान प्रदान किया जाए।



हम आशा करते हैं कि छत्तीसगढ़ शासन संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक विविधता एवं अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए उक्त आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त करेगा।


यदि शासन द्वारा उक्त आदेश को वापस नहीं लिया जाता है, तो आदिवासी समाज एवं संयुक्त संगठन संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा हेतु अनुच्छेद 32 एवं अनुच्छेद 226 के अंतर्गत माननीय उच्चतम न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष जनहित याचिका (PIL) प्रस्तुत कर उक्त आदेश की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की मांग करेंगे तथा इसे संविधान के अनुच्छेद 13, 14, 15, 25, 28, 29, 46, पांचवीं अनुसूची एवं संविधान की धर्मनिरपेक्ष मूल भावना के विरुद्ध घोषित किए जाने का निवेदन करेंगे।


साथ ही, यदि जांच एवं न्यायिक परीक्षण में यह स्थापित होता है कि किसी सक्षम अधिकारी अथवा लोक सेवक द्वारा अपने संवैधानिक दायित्वों की उपेक्षा करते हुए असंवैधानिक आदेश जारी किया गया है अथवा उसका क्रियान्वयन कराया गया है, तो उनके विरुद्ध लागू सेवा नियमों, प्रशासनिक उत्तरदायित्व एवं अन्य विधिक प्रावधानों के अंतर्गत आवश्यक अनुशासनात्मक एवं वैधानिक कार्यवाही किए जाने की मांग भी की जाएगी।


अतः आपसे निवेदन है कि संविधान की मूल भावना, आदिवासी समाज की सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान, अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों तथा भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा हेतु उक्त आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की कृपा करें। सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष रोहित माहला , महासचिव सुन्हेर कोसमा, आत्मा राम कौड़ो अध्यक्ष गोंडवाना समाज ब्लाक डौंडी एवं अन्य आदिवासी समाजिक पदाधिकारी गण मौजूद रहे।

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