राष्ट्रीय जंबूरी की चमक के पीछे छुपते सवाल

 ब्यूरो समाचार -दिनेश कुमार नेताम  

स्थान - बालोद 

विवादों से घिरे चेहरे को जिम्मेदारी, प्रशासन की मंशा पर सीधा हमला


 छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के ग्राम दुधली में प्रस्तावित प्रथम राष्ट्रीय रोवर रेंजर जंबूरी को लेकर जिला प्रशासन उत्सव और उपलब्धि का वातावरण गढ़ने में जुटा है। निरीक्षण, निर्देश और तैयारियों के दावों के बीच यह आयोजन जिले और प्रदेश की प्रतिष्ठा से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है।



लेकिन इसी भव्यता के आवरण के पीछे एक ऐसा निर्णय सामने आया है, जिसने पूरे आयोजन की विश्वसनीयता पर कठोर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। शिक्षा विभाग द्वारा इस राष्ट्रीय आयोजन की अहम जिम्मेदारी ऐसे अधिकारी को सौंपे जाने की चर्चा है, जिनका नाम लंबे समय से विवादों, शिकायतों और गंभीर आरोपों के साथ जुड़ा रहा है। यह फैसला केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि नैतिक साहस की कमी का प्रतीक बनकर उभरा है। राष्ट्रीय स्तर का आयोजन केवल कार्यक्रम नहीं होता, वह शासन की सोच, पारदर्शिता और प्रशासनिक संवेदनशीलता का आईना होता है। ऐसे आयोजन में बच्चों, युवाओं और देशभर से आने वाले प्रतिभागियों की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान सर्वोपरि होता है। इसी पृष्ठभूमि में सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद ने इस नियुक्ति पर तीखा और दो टूक विरोध दर्ज कराया है। उनका कहना है कि जिन अधिकारियों की कार्यशैली पहले से सवालों के घेरे में रही हो, जिन्हें लेकर कर्मचारी वर्ग में भय और असंतोष की भावना रही हो, उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपना प्रशासनिक संरक्षण का खुला उदाहरण है। मोहन निषाद का आरोप है कि यह निर्णय ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों के



मनोबल को तोड़ने वाला है। उनके अनुसार जब विवादित छवि वाले लोगों को बार बार महत्वपूर्ण पद दिए जाते हैं, तो यह संदेश जाता है कि जवाबदेही और नैतिकता का कोई महत्व नहीं रह गया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय आयोजन को प्रयोगशाला बनाकर प्रशासन अपनी ही साख दांव पर लगा रहा है। जिस अधिकारी को नोडल की भूमिका सौंपी जाने की चर्चा है, उनके खिलाफ पूर्व में सरकारी संसाधनों


के दुरुपयोग, कार्यालयीन दबाव और अधीनस्थ कर्मचारियों के मानसिक शोषण जैसे आरोप लगते रहे हैं। कर्मचारी संगठनों और आंतरिक शिकायतों में यह नाम लंबे समय से असंतोष और डर का पर्याय रहा है। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि क्या जिला प्रशासन इन तथ्यों से अनजान है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदकर विवादों को न्योता दिया जा रहा है।राष्ट्रीय जंबूरी जैसे आयोजन में बड़े पैमाने पर खर्च, व्यवस्थाओं और निर्णयों की श्रृंखला जुड़ी होती है। भोजन, आवास, परिवहन और सामग्री प्रबंधन जैसे



क्षेत्रों में पारदर्शिता और ईमानदारी की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। मोहन निषाद का कहना है कि जहां शक्ति और संसाधन एक साथ आते हैं, वहां साफ नीयत ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होती है। लेकिन यहां उलटा रास्ता अपनाया गया प्रतीत होता है। यही कारण है कि स्थानीय नागरिकों में आशंका गहराने लगी है कि कहीं यह आयोजन अव्यवस्था, पक्षपात और संभावित अनियमितताओं की भेंट न चढ़ जाए। इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू प्रशासन की चुप्पी है। उठते सवालों पर न तो कोई स्पष्ट जवाब सामने आया है और न ही नियुक्ति के औचित्य को सार्वजनिक रूप से रखा गया है। यह मौन स्वयं में बहुत कुछ कहता है और संदेह को और गहरा करता है। जब शासन जनता के भरोसे से चलता है, तब ऐसे निर्णयों पर पारदर्शी संवाद अनिवार्य होता है।राष्ट्रीय जंबूरी जैसे कार्यक्रम छत्तीसगढ़ और बालोद जिले की छवि को देशभर के सामने प्रस्तुत करते हैं। यदि आयोजन की कमान विवादों से घिरे चेहरों के हाथों में दी जाती है, तो यह सीधे तौर पर प्रशासन की विश्वसनीयता और शासन की गरिमा पर आघात है। जागरूक नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद की स्पष्ट मांग है कि इस नियुक्ति पर तत्काल पुनर्विचार हो, पूर्व आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और राष्ट्रीय जंबूरी को हर प्रकार के विवाद से दूर रखा जाए। क्योंकि यदि यह आयोजन सवालों में घिरा, तो जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की मानी जाएगी।

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