छत्तीसगढ़ी भाखा के हक के लिये बालोद में गूँजी हुंकार: 'गुनान गोष्ठी' और साहित्यकार सम्मेलन संपन्न

 ब्यूरो समाचार -दिनेश कुमार नेताम 

स्थान -बालोद 

बालोद, छत्तीसगढ़ी भाषा को राजकाज और शिक्षा में सम्मानजनक स्थान दिलाने के संकल्प के साथ बालोद के स्थानीय कला केंद्र में आयोजित 'गुनान गोष्ठी' एवं साहित्यकार सम्मेलन स्वर्णिम सफलता के साथ संपन्न हुआ। छत्तीसगढ़ी समाज बालोद द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रदेश भर के साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों ने एक सुर में मातृभाषा के अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की।


*राजगीत से हुआ भव्य शुभारंभ*

कार्यक्रम का गौरवपूर्ण शुभारंभ रानू निषाद द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ राजगीत 'अरपा पैरी के धार' के साथ हुआ। मधुर स्वर में गाए गए राजगीत ने पूरे वातावरण को छत्तीसगढ़ी अस्मिता के रंग में सराबोर कर दिया।

*वरिष्ठ साहित्यकारों ने साझा किए विचार*

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. सत्यजीत साहू ने अपने उद्बोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी पहचान है, हमें इसके सम्मान के लिये आवाज बुलंद करना होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे घनश्याम गजपाल ने भाषा के संवैधानिक अधिकारों पर जोर दिया। वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश देशमुख ने छत्तीसगढ़ की भाषाई इतिहास पर सारगर्भित उद्बोधन में पुरखों के संघर्ष को याद किया। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. अशोक आकाश ने छत्तीसगढ़ी को शिक्षा और प्रशासनिक कार्य में अनिवार्य रूप से लागू करने की आवश्यकता जोर देते कहा- छत्तीसगढ़ राज्य बने पच्चीस साल पूर्ण हो गये हैं लेकिन अब तक जो सम्मान छत्तीसगढ़ी को मिलना चाहिये वह आज तक नहीं मिल पाया, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग भी शासन द्वारा मिले बजट को खर्च कर कर्तव्य की इतिश्री तक ही सीमित है। 

गोष्ठी में प्रदेश के अन्य प्रबुद्ध वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के मानपुर मोहला जिला समन्वयक डॉ. इकबाल खान 'तन्हा' ने छत्तीसगढ़ी के साहित्यिक वैभव पर प्रकाश डाला।

सुरगी राजनॉंदगॉंव से आयेओमप्रकाश साहू 'अंकुर' ने युवा पीढ़ी को मातृभाषा से जोड़ने का आह्वान किया।

मनोज कुमार साहू ने सामाजिक स्तर पर भाषा के प्रचार-प्रसार पर बल दिया।

डॉ.अशोक आकाश के कुशल संयोजन में आयोजित यह कार्यक्रम अपनी व्यवस्था और वैचारिक स्पष्टता के कारण बेहद सफल रहा। मंच का शानदार युगल संचालन हर्षा देवांगन और वीरेन्द्र अजनबी ने अपनी ओजस्वी शैली में किया, जिसने अंत तक श्रोताओं को बांधे रखा।

सम्मेलन के अंत में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि छत्तीसगढ़ी भाषा के हक की यह लड़ाई अब गाँव-गांँव तक ले जाई जाएगी। कार्यक्रम में नवोदित साहित्यकार लालेश्वर अरुणाभ को वनल साहित्य लेखन हेतु सम्मानित किया गया। इस स्वर्णिम सफल आयोजन में आचार्य ऋतेश्वरानंद अवधूत, तामस्कर साहू,हेमलाल सोनबेर एवं राजेश सोनी का महत्वपूर्ण योगदान रहा, वरिष्ठ साहित्यकार पुष्कर सिंह राज, देवनारायण नगरिहा, सेवानिवृत्त शिक्षक बी.आर.बेल्सर, धर्मेन्द्र कुमार श्रवण, संदीप चौहान, भोज राम साहू, चन्द्रशेखर चन्द्राकर , यदुनाथ, मकसूदन, देवसिंग, योगेश छत्तीसगढ़िया, डॉ.एस.एल गंधर्व, हेमसिंह साहू, डॉ.ताम्रध्वज साहू, हिरेन्द्र कुमार, रामकुमार साहू, गजेन्द्र साहू, नंदकुमार गजपाल, रुपेन्द्र कुमार साहू,मन्नू लाल साहू, पवन सोनवानी, पुरानिक राम, मोहन लाल सिन्हा, मोहित राम साहू, पुरुषोत्तम कुमार, सुरेश कुमार, जयेश मिश्रा, राजेश साहू, हरीश कुमार साहू, बिनोद वैद्य, लक्ष्मण वर्मा, भुनेश्वर निषाद सहित


भारी संख्या में मौजूद साहित्यकार युवा, किसान एवं बुद्धिजीवियों ने इस मुहिम को अपना पूर्ण समर्थन दिया। कार्यक्रम के अंत में विश्व महिला दिवस पर आयोजित इस आयोजन में उपस्थित श्रीमती हर्षा देवॉंगन एवं सुप्रसिद्ध कला साधिका रानू निषाद को सम्मानित कर छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी साहित्यकार स्वर्गीय सुशील भोले को मौन श्रद्धांजलि के साथ छत्तीसगढ़ी समाज प्रदेश अध्यक्ष सत्यजीत साहू के आभार प्रदर्शन से कार्यक्रम समापन की घोषणा की गई।


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