छत्तीसगढ़ ब्यूरो हेड दिनेश कुमार नेताम
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. परदेशी राम वर्मा बालोद जिले में भ्रमण पर रहे, इस दौरान उन्होंने अपनी यात्रा गंगा मैया से प्रारंभ किया, बालोद जिला कलेक्टर श्रीमती दिव्या उमेश मिश्रा, जिला पंचायत अध्यक्ष तारिणी चंद्राकर, उपाध्यक्ष तोमन साहू एवं जिला व्यवहार न्यायधीश सागर चन्द्राकर को अपने सम्पादन में प्रकाशित पुस्तक शहीद दुर्वासा निषाद एवं हमारा बालोद जिला भेंट किया ।
डॉ.परदेशी राम वर्मा द्वारा सम्पादित उक्त पुस्तक में बालोद जिले के पुरातात्विक महत्व के स्थानों बालोद जिले का नाम गौरवान्वित करने वाले विभूतियों आध्यात्मिक पौराणिक महत्व के देवस्थल पर महत्वपूर्ण लेख आठ साहित्यकारों द्वारा लिखित है जिनमें मुनी लाल निषाद, बद्रीप्रसाद पारकर, शिवकुमार गायकवाड़, डॉ.अशोक आकाश, डॉ.शिरोमणी माथुर, स्मिता वर्मा एवं स्वयं डॉ.परदेशी राम वर्मा द्वारा लिखित है उक्त पुस्तक के लेखन में बालोद जिले के ऐतिहासिक स्थलों के रखरखाव एवं यथोचित संरक्षण की दिशा में कार्य के लिये जन जागरुकता का उद्देश्य समाहित है। इसी परिप्रेक्ष्य में बालोद आये छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.परदेशी राम वर्मा ने बालोद जिले के गौरव स्थल का निरीक्षण किया, उन्होंने पत्रिका में विगत दिवस प्रकाशित समाचार में बालोद के बूढ़ातालाब पार स्थित भग्न किला और प्राचीन पाषाण प्रतिमा पर प्रकाशित लेख पढ़कर उक्त स्थल का निरीक्षण किया जो देखरेख के अभाव में अराजक तत्वों द्वारा खण्डित कर दिया गया है। गोंडवंशी राजा द्वारा निर्मित बालोद स्थित भग्न हो चुके किले में खडे़ विराट वटवृक्ष और संग्रहालय देख वे विस्मित हो गये। पुरातत्विक महत्व के इतने बड़े संग्रहालय और किले पर प्रशासनिक उपेक्षा देख वे क्षुब्ध हुए। वे सिया देवी भी देख आए। पुस्तक में सियादेवी स्थल का भी वर्णन है। लोकमान्यता है कि वन-वन सीता को याद कर हा सीते, हा सीते कहकर विलाप करते श्री राम को देखकर सती को भ्रम हो गया कि विष्णु के अवतार राम अगर भगवान है तो सामान्य मनुष्य की तरह विलाप कैसे कर रहे हैं। सती की शंका पर शिव ने परीक्षा की अनुमति दी। सती ने सीताजी का स्वांग कर लिया और श्रीराम के आगे खड़ी हो गईं।
सती को ग्लानि हुई, वह शिव के पास गई तो शिवजी ने कहा कि सीताजी का रुप धारण कर तुमने मर्यादा का खण्डन किया, हम प्रभु श्रीराम की आराधना करते हैं, सम्मान करते हैं। अब तुम करीब आने की पात्रता खो चुकी हो । भगवान राम की परीक्षा लेने की घटना जिस जंगल में घटी, वह बालोद जिले का वही वन है जहाँ सिया देवी का भव्य मंदिर है। वहाँ गहराई में गुफा भी है।
हमारे गुरु स्व अमृत दास जी द्वारा जन संबल के बल पर निर्मित करोड़ों का कबीर धाम भी देख आए। गुरूजी पिछले वर्ष ९१वर्ष की उम्र में गुजरे।
उनके द्वारा संचालित अकिंचन धर्मशाला अब वीरान है जहां रहकर पढ़-लिख कर आई ए एस आइ पी एस बनने वाले और प्रसिद्ध शिक्षाविदों के इस आश्रय स्थल में गुरुजी की यादें बसी है। जब अमृत दास दास जी ग्राम गोढ़ी में शिक्षक रहे तब उन्होंने डॉ. परदेशी राम वर्मा जी को शिक्षा प्रदान किया था, वे बी एल ठाकुर पूर्व आई ए एस के भी गुरू रहे। कंगला मॉंझी धाम बघमार पहुँच कर वर्मा जी ने कंगाल मॉंझी को नमन कर उनके परिजन को पुस्तक भेंटकर श्रद्धांजलि समर्पित किया। इस पुस्तक में डॉ.अशोक आकाश एवं डॉ.परदेशी राम वर्मा द्वारा लिखित लेख है जिसके द्वारा आज की युवा पीढ़ियों को राष्ट्र भक्ति का संदेश सम्प्रेषित किया गया है।
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